- बहुत कुछ बदल गया है , पहले मम्मी स्कूल जाने के लिए सुबह उठाया करती थी फिर हमने अलार्म लगाना शुरू कर दिया शायद तब ही से जिंदगी बेकार सी हो गयी, दोस्त जब से WhatsApp चलाने लगे शायद दूरी भी तब ही से बढ़ गयी नोस्टालजिक कहो या कुछ भी पर सच है ये |
- तुम्हारे लिए भी अब धीरे धीरे सारी आदत जाती जा रही हैं , अब पुराने मैसेज भी नहीं पढता तुम्हारे , न बार बार प्रोफाइल खोलता अब तुम्हारी और न ही अब सपने भी देखता बस एक आदत नहीं जा पा रही , एक दम चिपक सी गयी है , हाँ तुम्हारा नाम लिखने की आदत ...नहीं जा रही है |
- पहले भी हर जगह लिख दिया करता था तुम्हारा नाम शायद वो नाम तुम्हारे वहां होने का एहसास दिलाता है , कभी अपने हाथ में लिख लिया करता और सब से पुरे दिन छुपाते फिरता था, कभी कॉपी के आखिरी पन्ने में अपने साथ तुम्हारा नाम लिख देता था और फिर गाढ़े रंग से उसे काट देता था , कभी बोर्ड के सबसे किनारे तुम्हारे नाम का पहला अक्षर लिख देता था और फिर हाथ से ही मिटा देता था , उस नदी की रेत में जरूर आज भी तुम्हारा नाम लिखा होता अगर मैंने उसे भी न मिटाया होता तो शायद हमेसा से ही इस बात का डर था की कोई तुम्हारा नाम पढ़ न ले बहुत संभल कर रखा था मेने तुम्हारा नाम बस एक जगह ही तुम्हारा नाम नहीं लिख पाया और न ही उस जगह से मिटा पाया आज भी तुम जब बहुत याद आती हो सामने वाले कांच में जमी हुई ओस में सुबह सुबह तुम्हारा नाम लिख कर मुशुकरा लेता हु और तब तक देखता रहता हु जब तक धूप खुद ही उसे न मिटा दे |
Wednesday, 21 December 2016
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