" सत्ता समाज और साहित्य "
भारत माता की जय और गिलास आधा खाली नहीं है आधा भरा हुआ है | ये जरुरी लगा मुझे स्टार्टिंग me कहना ताकि मेरी देशभक्ति पर शक़ न किआ जाये और मुझे नकारात्मक न समझ जाये |
अपनी एक कहानी से स्टार्ट करता हु , मेरे 9th में 7.6 CGPA आये अब तक के सबसे ज्यादा, घर में सब खुश थे ,पापा भी रस मलाई ले कर आ गए,मुझे लगा मेरे छोटे भाई को बर्फी ज्यादा पसंद है इसलिए वो उस दिन गुस्सा हो गया, छोटी सी ही बात थी तो गुस्सा क्यों हो गया ? मुझे लगने लगा की ये पापा से उतना प्यार नहीं करता जितना मैं करता हु, सही भी तो था मैं पापा इतना खुश हो कर लाये थे और वो गुस्सा हो गया ,मैंने मम्मी से पूछा की वो ऐसा क्यों कर रहा है ?? इस बात को अभी यहीं रोक देते हैं |
मेरा आज का विषय है सत्ता,साहित्य और समाज |
आज से 60 साल पहले जब मेरे किसी पूर्वज ने अपने डायरी में कुछ लिखा होगा तो उसका विषय रहा होगा समाज,साहित्य और सत्ता , क्रम देखिएगा मेरे में सत्ता पहले है उस वक़्त शायद समाज रहा होगा , साहित्य हमेसा मध्यस्त रहा |
चलते हैं उस वक़्त जहाँ से ये क्रम बदला था ..70 के दशक में इस देश को एक नारा मिला "INDIA IS INDIRA AND INDIRA IS INDIA " ये अब तक के किसी नेता की लोकप्रियता की चरम सीमा बताता है की उसे ही भारत समझ गया | जब ये नारा दिया गया तो नागार्जुन ने कहा "तू है आकाश में तेरे कदमो के नीचे जमीन नहीं, हैरान हु की तुझे अब तक है ये यकीन नहीं , याद रख तू इस मशीन का बस एक पुर्जा है ,मशीन नहीं | नागार्जुन का कद बहुत छोटा था उस वक़्त उनकी बात को बेवकूफी समझा गया उनके संपादक ने उन्हें निकाल दिया क्योंकि INDIRA IS INDIA AND INDIA IS INDIRA था , मगर उस बात का असर देश को तब दिखा जब इस देश में इमरजेंसी लगी, और तब इस देश को मह्सूस हुआ की नागार्जुन ने सच कहा था..Indira जी का देश प्रेम जग जाहिर है, मगर लोकप्रियता उन्हें एक गलत कदम की तरफ ले गयी वो खुद को शायद इंडिया समझने लगी थी | उस वक़्त इस देश में बहुत काबिल लेखक नागार्जुन, दुष्यंत कुमार , नेता अडवाणी ,जयप्रकाश नारायण,अटल जी ,अध्यापक सुभ्रमनियम स्वामी , और छात्र और अनेक देशवासी थे जिन्होंने इसका विरोध किया और इस देश को उस समय से निकाला | इंदिरा जी ने एक टीम नियुक्त की और सर्वे कराया की अगर आज जनमत हो तो उन्हें कितनी सीट मिलेंगी रिपोर्ट में बताया गया की इंदिरा जी 300+ सीट जीत रही हैं , इंदिरा जी ने चुनाव कराया और कांग्रेस पुरे देश से साफ़ हो गयी इसका मतलब यही है की जब तारीफ़ चाटुकारिता या भय का रूप ले लेती है तो वो भयानक होती है | आने वाली हर सरकार ने Indira जी से एक सीख ली की अगर आप इस देश में सत्ता को मजबूत करना चाहते हैं तो जो "mediocre" उन्हें आगे लाया जाये यानि जो औसत लोग हैं उन्हें आगे बढ़ाया जाये मगर शर्त ये थी की जो सीर्ष में हैं उनको पीछे कर के ये जो आरक्षण हर साल बढ़ जाता है और हर साल एक नयी जात जुड़ जाती है ये उसी नीति के फलस्वरूप है जनरल के लिए अब IAS सिर्फ मृगतृषडा बन गयी बस कुछ ही कस्तूरी सूंघ पाते हैं , एक औसत लड़का इस देश की प्रशासनिक सेवा के उच्च पद में पहुँच जाता है और जो हकदार है वो अवांछित रह जाता है , साहित्य अकादमी भी एक सफल प्रयास रहा लेखक के शब्द को बाँधने के लिए |
और इसका असर फिर समाज में भी दिखा घर का वो छोटा लड़का जो हर बात पर सवाल पूछना चाहता है और बड़े अक्खड़ अंदाज से किसी भी रिश्तेदार को जवाब देता है तो उसे चंचल या शैतान य नालायक समझ लिया जाता है और वो बड़ा लड़का सबसे शालीन होता है जो घर की हर बात में हाँ से हाँ मिलता है, शायद सही भी है वो क्योंकि ये वो अपना फर्ज समझता है | अध्यापक के लिए भी स्कूल की वो क्लास सबसे अच्छी होती है जो हल्ला नहीं करती , मतलब सवाल नहीं पूछती और जिस क्लास के मन में सवाल होता है वो उद्दंड क्लास होती है , क्लास का वो लड़का जो हर बात पर एक सवाल पूछता है वो सब अध्यापक और बच्चो की आँख में गड़ता है , मैं भी अपने स्कूल के टॉपर से बहुत जलता था पर धीरे धीरे मुझे ये लगा की मेरे जैसे सभी mediocre उसे उतना ही जलते है , उससे रट्टू समझते हैं, मगर नहीं वो रट्टू नहीं था ,हमने ये सीखा था की टॉपर अच्छे नहीं होते हम एवरेज ही सबसे अच्छे होते हैं, स्कूल में प्रिंसिपल भी वही बनता था जो डायरेक्टर या चेयरपर्सन के करीब होता था , यूनिवर्सिटी का VC भी वही बनता हैं जिसकी सरकार से अच्छी बनती हैं , ये असर इस देश के संविधान के एक खम्बे पर भी दिखने लगा हर शाम 9 बजे वही 4 लोग आ जाते हैं जो हर विषय में निपुण होते हैं चाहे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा हो, बॉर्डर की बात हो , दाल के दाम पर बेहेस हो ,कहीं के चुनाव पर हो ,बाढ़ पर हो , किसान की हालात पर हो ये 4 लोग हर विषय पर अपना विचार रखते हैं और अंत में हर विषय गाय,फ़ौज, तिरंगे पर ख़तम हो जाता है, ऐसा नहीं है की माड़ीशंकर अय्यर, संबित पात्रा, और त्यागी जी से अच्छे वक्ता नहीं हैं मगर उन्हें आगे नहीं आने दिया जाता क्योंकि अगर सशि थरूर आये तो वो तो अपनी ही पार्टी की भी आलोचना कर सकते हैं और भाजपा की तारीफ़ भी |
चाणक्य ने कहा था की जिस देश के दरबारी और कवि राजा की तारीफ करने लगे वो उस राज्य को क्षति पहुंचा रहे हैं, ओम पंवर जी जिहोने बीजेपी की राज्यसभा सीट ठुकरा दी थी आज वो भी मानते हैं की जब से उन्होंने प्रधानमंत्री जी की तारीफ लिखी तब से उनकी कलम में वो पैनापन नहीं रहा |
अब आते हैं उस कहानी में मम्मी ने मुझे बताया की बेटा तुम्हारा भाई पापा से प्यार करता है और उम्मीद रखता है इसीलिए वो उन पर गुस्सा भी हो सकता है इसे कुछ और समझना गलती होगी|
और तब मुझे ये बात समझ आयी जब मैंने देखा की यहाँ सिर्फ मोदी जी, केजरीवाल , मनमोहन सिंह इन्ही की आलोचना होती है क्योंकि लोग इनसे उम्मीद रखते हैं ,कभी कोई रमन सिंह को कुछ नहीं कहता | ये तो खैर मजाक था लेकिन बात ये है की सवाल पूछने वाले को आप गलत न समझें अगर मेरे मन में सवाल आता है की शिक्षा पर भी घोटाले वाले आराम से कैसे बैठे हैं ? जिस JNU के छात्र को पुरे देश ने एकमत में देशद्रोही घोषित कर दिया उस पर इस देश के सबसे बड़े प्रशासनिक संसथान ने एक भी चार्जशीट क्यों नहीं दायर की, ? और अगर उसमे उसका हाथ नहीं था तो असली कौन था ? अगर बर्बरता बाबर और औरंगज़ेब ने की तो बब्बन मियां का घर क्यों जल जाता है ? इस देश में गाय से भी दयनीय हालात मुझे मुर्गे की लगती है इसे आप मेरे देशप्रेम से नहीं जोड़ सकते क्योंकि आपको भी हॉकी से ज्यादा क्रिकेट पसंद है | बात ये है की अगर मुझे विराट कोहली नहीं पसंद तो क्या मैं इंडिया को जीतता हुआ नहीं देखना चाहता ? पर असल बात तो ये है की हम सबको कोहली पसंद है , जितना आप सब को | इस देश में एक संगठन ऐसा भी है जो लोगो की सेवा करता है , अनेक संसथान चलाता है मगर इस देश के राष्ट्रपिता के विचार को गलत समझता है पर हम उसे देशद्रोही कहे
ये गलत होगा मतलब विचार अलग हो सकते है, अगर आपके मन में सवाल नहीं उठता तो आप इस देश के आर्दश बड़े बेटे हैं और अगर हमे ये सवाल परेसान करता है की रोबर्ट वाड्रा को जेल भेजने की तयारी सिर्फ चुनाव के वक़्त ही क्यों होती है, ये हमारे पैसे के टैक्स से बने हुए बजट से भारत सरकार 20 हज़ार करोड़ रुपये उन बैंक को क्यों दे देती है जो अमीरो के सात हज़ार करोड़ माफ कर देती है और ब्याज न चूका पाने के कारण किसान खुद को अपने ही खेत के नारियल से निकली हुई रस्सी से लटका कर मार देता है ? अगर ये बेहुदा सवाल हमे परेसान करते हैं तो हम इस भारत माँ के छोटे बच्च्चे हैं , आप बड़े हैं हम छोटे हैं लेकिन हैं भारत माँ के ही बेटे |
भारत माता की जय और गिलास आधा खाली नहीं है आधा भरा हुआ है | ये जरुरी लगा मुझे स्टार्टिंग me कहना ताकि मेरी देशभक्ति पर शक़ न किआ जाये और मुझे नकारात्मक न समझ जाये |
अपनी एक कहानी से स्टार्ट करता हु , मेरे 9th में 7.6 CGPA आये अब तक के सबसे ज्यादा, घर में सब खुश थे ,पापा भी रस मलाई ले कर आ गए,मुझे लगा मेरे छोटे भाई को बर्फी ज्यादा पसंद है इसलिए वो उस दिन गुस्सा हो गया, छोटी सी ही बात थी तो गुस्सा क्यों हो गया ? मुझे लगने लगा की ये पापा से उतना प्यार नहीं करता जितना मैं करता हु, सही भी तो था मैं पापा इतना खुश हो कर लाये थे और वो गुस्सा हो गया ,मैंने मम्मी से पूछा की वो ऐसा क्यों कर रहा है ?? इस बात को अभी यहीं रोक देते हैं |
मेरा आज का विषय है सत्ता,साहित्य और समाज |
आज से 60 साल पहले जब मेरे किसी पूर्वज ने अपने डायरी में कुछ लिखा होगा तो उसका विषय रहा होगा समाज,साहित्य और सत्ता , क्रम देखिएगा मेरे में सत्ता पहले है उस वक़्त शायद समाज रहा होगा , साहित्य हमेसा मध्यस्त रहा |
चलते हैं उस वक़्त जहाँ से ये क्रम बदला था ..70 के दशक में इस देश को एक नारा मिला "INDIA IS INDIRA AND INDIRA IS INDIA " ये अब तक के किसी नेता की लोकप्रियता की चरम सीमा बताता है की उसे ही भारत समझ गया | जब ये नारा दिया गया तो नागार्जुन ने कहा "तू है आकाश में तेरे कदमो के नीचे जमीन नहीं, हैरान हु की तुझे अब तक है ये यकीन नहीं , याद रख तू इस मशीन का बस एक पुर्जा है ,मशीन नहीं | नागार्जुन का कद बहुत छोटा था उस वक़्त उनकी बात को बेवकूफी समझा गया उनके संपादक ने उन्हें निकाल दिया क्योंकि INDIRA IS INDIA AND INDIA IS INDIRA था , मगर उस बात का असर देश को तब दिखा जब इस देश में इमरजेंसी लगी, और तब इस देश को मह्सूस हुआ की नागार्जुन ने सच कहा था..Indira जी का देश प्रेम जग जाहिर है, मगर लोकप्रियता उन्हें एक गलत कदम की तरफ ले गयी वो खुद को शायद इंडिया समझने लगी थी | उस वक़्त इस देश में बहुत काबिल लेखक नागार्जुन, दुष्यंत कुमार , नेता अडवाणी ,जयप्रकाश नारायण,अटल जी ,अध्यापक सुभ्रमनियम स्वामी , और छात्र और अनेक देशवासी थे जिन्होंने इसका विरोध किया और इस देश को उस समय से निकाला | इंदिरा जी ने एक टीम नियुक्त की और सर्वे कराया की अगर आज जनमत हो तो उन्हें कितनी सीट मिलेंगी रिपोर्ट में बताया गया की इंदिरा जी 300+ सीट जीत रही हैं , इंदिरा जी ने चुनाव कराया और कांग्रेस पुरे देश से साफ़ हो गयी इसका मतलब यही है की जब तारीफ़ चाटुकारिता या भय का रूप ले लेती है तो वो भयानक होती है | आने वाली हर सरकार ने Indira जी से एक सीख ली की अगर आप इस देश में सत्ता को मजबूत करना चाहते हैं तो जो "mediocre" उन्हें आगे लाया जाये यानि जो औसत लोग हैं उन्हें आगे बढ़ाया जाये मगर शर्त ये थी की जो सीर्ष में हैं उनको पीछे कर के ये जो आरक्षण हर साल बढ़ जाता है और हर साल एक नयी जात जुड़ जाती है ये उसी नीति के फलस्वरूप है जनरल के लिए अब IAS सिर्फ मृगतृषडा बन गयी बस कुछ ही कस्तूरी सूंघ पाते हैं , एक औसत लड़का इस देश की प्रशासनिक सेवा के उच्च पद में पहुँच जाता है और जो हकदार है वो अवांछित रह जाता है , साहित्य अकादमी भी एक सफल प्रयास रहा लेखक के शब्द को बाँधने के लिए |
और इसका असर फिर समाज में भी दिखा घर का वो छोटा लड़का जो हर बात पर सवाल पूछना चाहता है और बड़े अक्खड़ अंदाज से किसी भी रिश्तेदार को जवाब देता है तो उसे चंचल या शैतान य नालायक समझ लिया जाता है और वो बड़ा लड़का सबसे शालीन होता है जो घर की हर बात में हाँ से हाँ मिलता है, शायद सही भी है वो क्योंकि ये वो अपना फर्ज समझता है | अध्यापक के लिए भी स्कूल की वो क्लास सबसे अच्छी होती है जो हल्ला नहीं करती , मतलब सवाल नहीं पूछती और जिस क्लास के मन में सवाल होता है वो उद्दंड क्लास होती है , क्लास का वो लड़का जो हर बात पर एक सवाल पूछता है वो सब अध्यापक और बच्चो की आँख में गड़ता है , मैं भी अपने स्कूल के टॉपर से बहुत जलता था पर धीरे धीरे मुझे ये लगा की मेरे जैसे सभी mediocre उसे उतना ही जलते है , उससे रट्टू समझते हैं, मगर नहीं वो रट्टू नहीं था ,हमने ये सीखा था की टॉपर अच्छे नहीं होते हम एवरेज ही सबसे अच्छे होते हैं, स्कूल में प्रिंसिपल भी वही बनता था जो डायरेक्टर या चेयरपर्सन के करीब होता था , यूनिवर्सिटी का VC भी वही बनता हैं जिसकी सरकार से अच्छी बनती हैं , ये असर इस देश के संविधान के एक खम्बे पर भी दिखने लगा हर शाम 9 बजे वही 4 लोग आ जाते हैं जो हर विषय में निपुण होते हैं चाहे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा हो, बॉर्डर की बात हो , दाल के दाम पर बेहेस हो ,कहीं के चुनाव पर हो ,बाढ़ पर हो , किसान की हालात पर हो ये 4 लोग हर विषय पर अपना विचार रखते हैं और अंत में हर विषय गाय,फ़ौज, तिरंगे पर ख़तम हो जाता है, ऐसा नहीं है की माड़ीशंकर अय्यर, संबित पात्रा, और त्यागी जी से अच्छे वक्ता नहीं हैं मगर उन्हें आगे नहीं आने दिया जाता क्योंकि अगर सशि थरूर आये तो वो तो अपनी ही पार्टी की भी आलोचना कर सकते हैं और भाजपा की तारीफ़ भी |
चाणक्य ने कहा था की जिस देश के दरबारी और कवि राजा की तारीफ करने लगे वो उस राज्य को क्षति पहुंचा रहे हैं, ओम पंवर जी जिहोने बीजेपी की राज्यसभा सीट ठुकरा दी थी आज वो भी मानते हैं की जब से उन्होंने प्रधानमंत्री जी की तारीफ लिखी तब से उनकी कलम में वो पैनापन नहीं रहा |
अब आते हैं उस कहानी में मम्मी ने मुझे बताया की बेटा तुम्हारा भाई पापा से प्यार करता है और उम्मीद रखता है इसीलिए वो उन पर गुस्सा भी हो सकता है इसे कुछ और समझना गलती होगी|
और तब मुझे ये बात समझ आयी जब मैंने देखा की यहाँ सिर्फ मोदी जी, केजरीवाल , मनमोहन सिंह इन्ही की आलोचना होती है क्योंकि लोग इनसे उम्मीद रखते हैं ,कभी कोई रमन सिंह को कुछ नहीं कहता | ये तो खैर मजाक था लेकिन बात ये है की सवाल पूछने वाले को आप गलत न समझें अगर मेरे मन में सवाल आता है की शिक्षा पर भी घोटाले वाले आराम से कैसे बैठे हैं ? जिस JNU के छात्र को पुरे देश ने एकमत में देशद्रोही घोषित कर दिया उस पर इस देश के सबसे बड़े प्रशासनिक संसथान ने एक भी चार्जशीट क्यों नहीं दायर की, ? और अगर उसमे उसका हाथ नहीं था तो असली कौन था ? अगर बर्बरता बाबर और औरंगज़ेब ने की तो बब्बन मियां का घर क्यों जल जाता है ? इस देश में गाय से भी दयनीय हालात मुझे मुर्गे की लगती है इसे आप मेरे देशप्रेम से नहीं जोड़ सकते क्योंकि आपको भी हॉकी से ज्यादा क्रिकेट पसंद है | बात ये है की अगर मुझे विराट कोहली नहीं पसंद तो क्या मैं इंडिया को जीतता हुआ नहीं देखना चाहता ? पर असल बात तो ये है की हम सबको कोहली पसंद है , जितना आप सब को | इस देश में एक संगठन ऐसा भी है जो लोगो की सेवा करता है , अनेक संसथान चलाता है मगर इस देश के राष्ट्रपिता के विचार को गलत समझता है पर हम उसे देशद्रोही कहे
ये गलत होगा मतलब विचार अलग हो सकते है, अगर आपके मन में सवाल नहीं उठता तो आप इस देश के आर्दश बड़े बेटे हैं और अगर हमे ये सवाल परेसान करता है की रोबर्ट वाड्रा को जेल भेजने की तयारी सिर्फ चुनाव के वक़्त ही क्यों होती है, ये हमारे पैसे के टैक्स से बने हुए बजट से भारत सरकार 20 हज़ार करोड़ रुपये उन बैंक को क्यों दे देती है जो अमीरो के सात हज़ार करोड़ माफ कर देती है और ब्याज न चूका पाने के कारण किसान खुद को अपने ही खेत के नारियल से निकली हुई रस्सी से लटका कर मार देता है ? अगर ये बेहुदा सवाल हमे परेसान करते हैं तो हम इस भारत माँ के छोटे बच्च्चे हैं , आप बड़े हैं हम छोटे हैं लेकिन हैं भारत माँ के ही बेटे |
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