Tuesday, 11 October 2016

  1. छत देखे हैं कभी ?? अब आप सोच रहे होंगे ये कैसा सवाल है जाहिर सी बात है सबने देखी ही होगी छत |
    नहीं ,नहीं देखी ही बहुत लोगो ने नहीं देखीं है ये जो आज कल मुम्बई ,पुणे ,बैंगलोर में पैदा होते हैं न वो बस 2 BHK में ही रह जाते हैं और ज्यादा से ज्यादा नीचे एक पार्क में वो भी SATURDAY SUNDAY .
    मैंने खुद नहीं देखी छत जहाँ मैं डेढ़ साल से रह रहा हु , मुझे याद है एक बार वो गुस्सा हो गयी थी क्योंकि उसने उस शाम छत पर बुलाया था और मैं गया नहीं, फिर 2 दिन तक नाराज थीं वो, खैर छोड़िये तो चल...िए मान लीजिये यहाँ छत नहीं होती यहाँ एक बालकनी होती है छोटी सी जहाँ से हम भागती दुनिया को देख सकते हैं कुछ देर रुक कर | आज छुट्टी थी तो देर से उठा जब दोपहर को बालकनी में तौलिया लेने गया तो एक बहुत क्यूट सा टेडी बियर टाइप का लड़का ज़िद्द कर कर रो रहा था लग रहा था की जैसे उसे अब २-३ महीने पहले की साइकिल पुरानी लगने लगी और अब उसे पार्क में आने वाले उसके दूसरे दोस्त की तरह ही साइकिल चाहिए ||
    इतने में ही मेरी नजर पड़ी एक मेरे जैसे ही काले छोटे शैतान लड़के पर जिसकी शर्ट और पैंट का कॉम्बिनेशन मुझे सही नहीं बैठ रहा था, शर्ट भी बस अब एक दो दिन और चलती शायद उसकी अपनी माँ के साथ था माँ के लंबे कदम के साथ खुद अपने कदम मिला नहीं पा रहा था इसलिए शायद दौड़ लगा रहा था कितना मासूम था न वो , मैं उसकी मासूमियत में खोया ही था की एक कंकड़ चुभ गया उसके पाँव में रुक गया वो मेरे दिल की तरह, हाँ उसके चेहरे की मासूमियत के आगे मैंने ये तो देखा ही नहीं की उसके पाँव में चप्पल तक नहीं है मैं सोचने लगा इतनी तेज धूप में कैसे सेहता होगा ये सब अब मुझे समझ आया की आखिर रफ़्तार क्यों थी उसमे वो जानता था की अगर वो धीरे चला तो उसे इस गर्मी में और तपना पड़ेगा इतने में ही उस माँ ने कहा चलो जल्दी चलो "बाई आ गयी है कहा न अगले महीने जन्मदिन में नयी साइकिल दिला देंगे" वो लड़का पैडडल मार कर चल दिया अपने घर की तरफ उधर उस माँ ने अपने बच्चे को पुकारा अरे कहाँ रुक गया रे जल्दी आ दौड़ कर |
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    . सच कहूँ बहुत तेज थप्पड़ लगा मेरे गाल में, मैं चाहता था आपको भी लगे एक ||

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