Saturday, 10 June 2017

किसान - एक वोट

                                         

आज से बहुत सालो पहले किसान अन्नदाता हुआ करता था,धरती पर लोगो के भरड़ पोषण का जिम्मा अगर किसी के ऊपर था तो वो किसान था, फिर धरती औद्योगीकरण की और बढ़ी और अब कंधो पर भार भड़ता गया और किसान उद्योग में पिछड़ता गया, कई जगह हरित क्रांतियों ने जन्म लिए और एक घूँटा दिआ किसानो को, जिस ग्राफ से उन पर उम्मीदें बढ़ती गयी उसी ग्राफ से उनकी सामाजिक और आर्थिक स्तिथि गिरती गयी,जिस आजादी की नीव चम्पारण में किसान के छाती पर रख कर गयी थी आज उस आजादी का मोल किसान पा नहीं रहा, हर साल हर सरकार अपना HAPPY BIRTHDAY मनाती है मगर किसान तक केक कभी पहुँचता ही नहीं  है |

समय के साथ किसान बदला है, किसान अब अन्नदाता नहीं है, किसान अब वोट है | किसान वो वोट है जो न तो अल्पसंख्यंक का मजा लूटता है , न ही आरक्षण का तो एक पका पकाया वोट है किसान |
आज से बहुत साल पहले एक छोटे कांटी के नेता ने मंच से कहा 'जय जवान जय किसान" आज वो  किसान भी वोट है, और वो जवान भी | दिल के कहीं कोसो भीतर जो हमारे अंदर किसानो के प्रति प्रेम है जो अक्सर आर्टिकल में उभर आता है वो दरअसल जीवन में खो गया है, खेतो और सड़को पर आंदोलन करने वाले, भूँके पेट आसान करने वाले जब सत्ता में पहुँचते हैं तो वो खेत, वो भूँक भुला देते हैं, गलती उनकी नहीं है AC कैब में बैठ कर बाहर की दुनिया धूर्त और बेसहूर लगने ही लगती है, हालत ये है की किसान बस अब घोसड़ापत्र  में दीखता है, नेता जी की फोटो के निचे हल चलाता हुआ दीखता है, मगर दूर कहीं असल जिंदगी में वो इस चयन में लगा रहता है की रस्सी महंगी है या सल्फाश (जहर ) | आज किसान एक वोट है, जिसको एक पार्टी बोती है , दूसरी सींचती है और तीसरी काटने चली आती है, राजनीती प्रशंशा नहीं आलोचना के काबिल है क्यूंकि किसान भी वोट है और तुम भी वोट हो |

आज जब दोपहर में रोटी का पहला निवाला दाल में डुबोइएगा तो जीभ में लगाने से पहले सोचियेगा की कहीं इसे उगाने वाला जहर चखने की फ़िराक में तो नहीं है |     

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