Friday, 2 September 2016

जब लिख रहे हो तुम तो, ये बात भी लिखना।
तुम अपने इस देश के हालात भी लिखना।।
सब चल रहा है अच्छा, तुम दूसरों की 'मन की बात ' मत लिखना।
जब लिख रहे हो तुम, तो सिर्फ अपनी बात ही लिखना।। . . .


जब लिख रहे हो तुम, तो ये बात भी लिखना ।
इस देश पर लगा एक अभिशाप भी लिखना।।
तुम यह ना लिखना कि मर रहा है भूख से अन्नदाता।
जहर खाकर मरता है वो,तुम उसका स्वाभिमान भी लिखना।। . . .


जब लिख रहे हो तुम, तो ये बात भी लिखना।
होटल में काम कर रहे 'छोटू' के कन्धे का भार भी लिखना।।
किस मजबूरी में बनी वो 'वैश्या',वो हालात भी लिखना।
चौराहे पर बिक रही वर्दी के ' 3 स्टार ' भी लिखना।। . . .


अगर रह रहे हो 'दिल्ली' में तो ये बात भी लिखना।
तुम सिर्फ मुगलों और अंग्रेजों का अत्याचार मत लिखना।।
हर रात एक नई 'निर्भया' की पुकार तुम लिखना जब लगा था कलंक इस 'आदमी जात' पर,
मैट्रो का   पहला   डब्बा  देखकर वो बात भी लिखना।। . . .


जब लिख रहे हो तुम, तो ये बात भी लिखना।
खुद साम्प्रदायिक बन कर देश का माहौल तुम लिखना ।।
जब लिखना तुम 'मालदा' तो 'गुजरात' भी लिखना।
'टोपी' आौर 'गेरुए' के पीछे छिपे छ शैतान भी लिखना।।. . .


जब लिख रहे हो तुम, तो ये बात भी लिखना।
हो सके तो कुत्ते से प्यार और गाय पर अत्याचार तुम लिखना।।
तुम भूल कर भी 'धर्मम का व्यापार' मत लिखना।
ये ध्रुवीकरण का दौर है, तुम अखबार मत लिखना।।.


जब लिख रहे हो तुम,तो एक 'राज्य' भी लिखना।
गुरुनानक के प्यारे इन 'सरदार' को लिखना।।
लहलहाते खेत जो 'बिक' गए हैं 'नशे' में।
बहुत गिर चुका है जो आज उसे 'उडता पंजाब' मत लिखना।। . . .


हो अगर तुम युवा तो 'जसि्टन वीबर' की आवाज मत लिखना।
शिकागो में खड़े एक विवेकानन्द की दहाड़ तुम लिखना।।
मत लिखना अपने कलम से तुम इन नेताओं का झूठा देशप्रेम।
सीमा पर खडे जवान का 'तिरंगे' से तुम प्यार लिखना।।
     

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