Saturday, 17 September 2016

201009

201009 , यही लिखा था उस लाल डब्बे में,जिसे हम पोस्ट बॉक्स कहते हैं, चुप चाप खड़ा था वो गैलरिया मार्किट में, बगल में पड़ी पन्नी और कचड़ा उसकी बदहाली बयां कर रहे थे | मुझे देख बड़ा खुस हो कर बोला की मैं वही हु जिसने बाबु जी को पिता जी ,फिर पिता जी को पापा और अब पापा को डैडी बनने का सफर देखा है, उसे इस बदलाव से कोई ईर्ष्या नहीं है, मगर वो कहता है की कैसे वो लोग एक चिट्टी पाते ही खुस हो जाते थे,जो आज कल लोगो की फ़ोन काल काट दिया करते हैं | वो कहता है की मेरे चिट्टी जाने से लोगो में ...जो ख़ुशी होती थी उसकी भरपाई ये ईमेल और फ़ोन नहीं कर पाए, एक फौजी जब बॉर्डर से अपने घर चिट्टी भेजता था तो पूरा गाँव पढ़ कर रोता था, वो युवा ख़ुशी से नाच उठता था जब शहर के किसी सरकारी दफ्तर से उसके नौकरी का प्रस्ताव आता था,कैसे एक प्रेमी अपना कलेजा लिफ़ाफ़े में डाल कर अपनी प्रेमिका को दे देता था भाई की आँखें नम हो जाती थी बेहेन की राखी देख कर, मुझे खुद याद है की जब मैं मैं विदिशा में था तो हर साल रक्षाबंधन में मेरी बहनें मुझे राखी भेजती थी राखी वाले दिन सुबह से ही मैं दरवाजे पर चिट्टी के इन्तेजार में बैठा था और डॉनकिया भैया के आते ही उनकी साइकिल के पीछे दौड़ा और उनसे पूंछने लगा की क्या मेरे घर से भी चिट्टी आयी है मेरे सवाल को सुनकर उन्हें उदास देख कर मैं भी उदास हो गया |
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वो दुखी भी होता है क्योंकि उसने कभी कभी ऐसे पत्र भी भेजे जिसमे जिसमे उस लड़के की एक्सीडेंट की खबर रहती थी जिसका विवाह बस २ महीने पूर्व ही हुआ था | वो उदास था उस डाकिया की हालात देख कर जो कभी हर परिवार का सदस्य बन गया था उनकी ख़ुशी में खुस हो जाता था और उनके दुःख में चुप चाप उदास हो कर चला आता था और फिर से अपनी साइकिल में पैडल मारते अगले वाले घर की तरफ पुरानी बातो को भूल कर बढ़ निकलता था | शायद वो डाकिया नहीं था वो उम्मीद था वो ख़ुशी भी था वो अपना भी था जो समय के साथ घूम सा गया है |
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मैं फिर से कहता हूँ वो लाल डब्बा ईर्ष्या नहीं करता है इस आधुनिक जगत से बस दुखी है वो ||

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