Friday, 13 September 2024

My Poem



मैंने फिर से नहीं की कोशिसें शिद्दत से |

एक बार फिर इल्जाम किस्मत पर लगा दिया ||

रोया करते थे जो लोग मुझे बुलंदियों पर देखकर |

गिर कर आज मैंने उन्हें हंसना सिखा दिया ||

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जब भी होता हूं खुश मैं,तो कोई साथ क्यों नहीं होता |

मैं हर सुबह जाग तो जाता हूं, मगर जिन्दा क्यों नहीं होता ||

शाम होते ही पक्षी लौट आते हैं घोंसलो में अपने |

जो सुकून धरती मैं है वो आसमान में नहीं होता ||


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थक जाता हूं रो कर तो फिर सो जाता हूं मैं |

मैं रोते वक़्त माँ के करीब क्यों नहीं होता || 

की अगर बोलियां लगती इस जहाँ में भी आंसुओं की |

तो क्या मेरा तकिया भी कोहिनूर नहीं होता ||

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अब तो हर रिश्ता यहाँ सिर्फ मतलब से चलता है |

हर कोई चाहता तो है जन्नत मगर मारने से डरता है ||

कल देखा था मैंने कुछ बच्चो को बगीचे में खेलते हुए |

न जाने क्यों आज मेरा दिल भी बच्चा होने को करता है ||

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मैंने बादशाओं को भी रोते बिलखते देखा है |

भूँख और प्यास में भी मजदूर को हँसते देखा है ||

ठहरता तो है वह बस जो चलता है जमीन पर |

मैंने संगमरमर पर चलने वालो को अक्सर फिसलते देखा है ||.


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करने में विदाई बेटी की एक बाप बिक जाता है |

अगले ही दिन से बूढ़ी माँ का चूल्हा बुझ जाता है ||

लंबी कतारों में खड़े रहते हैं गरीब राशन की दूकान में |

दहेज़ के लिए अपनी ही बहुओं को जलाने वालो को,फिर कैसे मिटटी का तेल मिल जाता है ||

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वो अक्सर होटलों में काम करता नजर आता है |

पसीने की धार में उसका ख्वाब ही बह जाता है ||

लौटता है हर शाम जब वो अपनी मजदूरी लेकर |

भूक के आगे उसे खिलौना छोटा नजर आता है ||.

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गरीबी में न जाने उन्होंने कितने सपने खोये होंगे |

शहर में हुई है बारिश ,न जाने वो आज कहाँ सोये होंगे ||

दो दिन हो गए, आज भी भूके सो गए बच्चे |

मंदिर में दूध पीकर आज भगवान् भी खूब रोये होंगे ||


#Rupendra Singh

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